मोबाइल की दुनिया में सिमटता बचपन और टूटते रिश्ते
- vandana palli
- 2 days ago
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Updated: 12 minutes ago

मोबाइल की लोकप्रियता ने सहूलियत तो बहुत दी पर रिश्तों को संबंधों को गहरा आघात पहुंचाया, खास तौर से यदि हम किशोर होते बच्चों के परिपेक्ष्य में देखे तो सबसे ज्यादा।
आज से यदि बीस बाइस वर्ष के पूर्व की तरफ रुख करें तो वो एक समय था जब व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे से जुड़ा था।
लोग एक दूसरे से मिलने के लिए छुट्टी का वक्त तलाशते थे, कजिंस का एक दूसरे से मिलना साथ में एंजॉय करना जहां एक तरफ आपसी रिश्तों को मजबूत करता था वही दूसरी तरफ रिश्तों की अहमियत और वैल्यूज दिल दिमाग में पनपती थी।
बच्चें इंतजार करते थे जाड़े,गर्मी की छुट्टी में नाना नानी मामा, बुआ, ताया के घर जाने का या फिर उनके आने का।
रिश्तों का दायरा बहुत फैला हुआ था, आज की देखें तो तकनीकी दौर में रिश्ते भी तकनीकी हो गए हैं। बचपन में ही हाथ में मोबाइल आने से बच्चों की दुनिया एकदम अलग हो चुकी है, अपने आप में ही हर कोई सिमट के रह गया है।
हां ये बात सच है कि आज की शिक्षा प्रणाली भी पूर्ण रूप से तकनीक पर ही टिक गई है, लेकिन याद रखें कि जीवन मूल्यों को समझने के लिए व्यवहारिक शिक्षा की महत्ता को कतई नकारा नहीं जा सकता।
विगत कुछ वर्षो में तो और भी ज्यादा नैतिक मूल्यों का हरास हुआ है, कोविड महामारी की भीषणता में तीन से चार वर्ष के बच्चों को भी मोबाइल की बुरी लत से जूझना पड़ रहा, जहां माएं पहले अपने बच्चों को अंगूठा चूसने, ओठ चबाने जैसी आदतों से निजात दिलाती थी अब मोबाइल की लत को छुड़ाने में जूझना पड़ता है।
बच्चों की ये लत भावनात्मक रूप से पेरेंट्स से भुनाई जाती है, बच्चे को खाना खिलाना हो तो मोबाइल पकड़ा दो, होम वर्क कराना हो तो बाद में मोबाइल देने का प्रोमिस करो या फिर और कोई बात मनवानी हो तो मोबाइल या फिर कभी माँ को आराम चाहिए तो भी बच्चे को मोबाइल में इंगेज कर दो।
अब पेरेंट्स भी क्या करें, जिद्द और सहूलियत और बेवजह की मारा मारी से बेहतर लगता है कि बच्चे को इंगेज कर दो।
ये तो छोटे बच्चों की बात थी, यहां बनने बिगड़ने जैसी बातों से सरोकार नहीं है, हां! स्वास्थ की दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि बच्चो की आंख, दिमाग पर अति उपयोग का खराब असर न पड़े, उसकी नींद पूरी हो, शारीरिक एनर्जी पूरी हो, इन बातों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है।
अब आते है एडोलसेंस स्टेज की तरफ, आठ वर्ष से चौदह पंद्रह साल के बच्चों की तरफ़, ये वो उम्र है जहां बच्चों की तरफ पेरेंट्स का कंसर्न उसके शरीर से लेके शिक्षा, आदतों, व्यवहार सभी की तरफ बढ़ता है और बढ़ना भी चाहिए। यहां ये भी महत्वपूर्ण है कि इस उम्र के दरमियान तमाम हार्मोनल परिवर्तन भी होते है जिससे बच्चों के अंदर बहुत सी उत्सुकताएं, इच्छाएं (अच्छी बुरी दोनो) पनपती हैं।
आप महसूस करते हैं कि सारे सारे दिन बच्चा उसी छः बाई चार के खिलौने में आंख गड़ाए रहता है, कभी पढ़ाई कभी होम वर्क कभी असाइनमेंट तो कभी फ्रेंड्स के साथ ग्रुप डिस्कसन। पिछले पांच छः वर्षों से लगभग सभी पेरेंट्स के बच्चे इस दौर से गुजर रहे हैं, और ये भी सच है कि आप चौबीस घंटे उनके साथ नही बैठ सकते।
ऐसे में इतना ध्यान रखे कि बच्चे को पहली बात तो सेपरेट मोबाइल कतई न दे, अपने मोबाइल पर आप उसकी गतिविधियों को जान सकते हैं। समय सीमा का ध्यान अवश्य रखे, और बच्चों को प्रेरित करें कि वो शारीरिक गतिविधियों यानि गेम्स, साधारण कार्य, व्यक्तिगत मेल मिलाप में भी अपनी रुचि बनाए रखे। छुट्टियों में रिश्तेदारों से मिलना मिलाना बनाएं रखें और ये इंश्योर करें कि बच्चों का आपसी व्यवहारिक संबध बना रहे शारीरिक खेल कूद आउटिंग पर जोर रहे न कि एक कमरे में सब अपने मोबाइल में उलझे रहें। क्योंकि बच्चे मोबाइल में उलझ कर अपनी व्यावहारिकता खो रहे है बेशक पढ़ाई में आगे बढ़े हों, लेकिन आज भी आगे हाइ स्टडी एडमिशन के वक्त, जॉब इंटरव्यू के वक्त या किसी स्टेज पर व्याखान के वक्त जब पब्लिकली रूबरू होने की बारी आती है तो झिझक शर्म या संकोच महसूस न हो उस दृष्टि से बेहद जरूरी है, और ये वजह भी है कि मोबाइल के एडिक्शन की वजह से बच्चों का पब्लिक स्पीकिंग कॉन्फिडेंस , डिबेट, डिस्कशन जैसी प्रभावशाली क्रियाएं मंद पड़ गई है। या यूं कहें कि एक कोकून की भांति सिमटे पड़े रहना ही उनकी लाइफ स्टाइल बन चुकी है।
और एक पहलू, बच्चा जो कुछ भी देखता है उसे आत्मसात करता है तो व्यावहारिक रूप में एक अविभावक होने के नाते आपको अपने आप पर भी नियंत्रण रखना होगा, बच्चे के सामने या उसकी उपस्थिति में उसे प्रत्यक्ष समय दें न कि मोबाइल में लगे रहें उससे उसकी दिनचर्या, पढ़ाई, खेलकूद, होमवर्क, दोस्ती जैसे विषय पर बातें करें। ऐसा करके आप उसे व्यवहार कुशल बना सकते है। साथ ही तकनीक के अच्छे बुरे पहलुओं से रूबरू करवाते हुए बच्चों को रिश्ते नातों से भी जुड़े रहने की पहल करवाई जाए।
माता पिता ये भी इंश्योर करें कि बच्चे अपने बड़े बुजुर्गो से समय समय पर मिलते जुलते रहे, सभी रिश्ते नातों को शुरू से जानना समझना अपना कर्तव्य समझें। चूंकि भले ही आप जीवन में कितनी भी तरक्की कर ले, उच्च मुकाम हासिल कर लें पर अगर आप अपने रिश्ते नातों से जुड़ नही पाए उनको अहमियत नहीं दे पाए तो आप एक उत्तम इंसान कभी नही कहला सकेंगे।
- नीलिमा मिश्रा
श्री अयोध्या धाम में जन्मी पली बढ़ी एवं शिक्षा दीक्षा भी यहीं से प्राप्त की, पेशे से शिक्षिका रहीं एवं स्वभाव से लेखिका।
लेखन महज शौक नहीं जुनून है, अखबार पत्र पत्रिकाओं में लिखती आईं, सोशल मीडिया पर सक्रिय रूप से लिखती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें: कश्मकश ( प्रेरक कहानी संग्रह), दो लफ्ज़ों की दिल की कहानी..(कविताएं एवं शायरी)
मेरा मानना है कि लेखन एक सशक्त माध्यम है समाज को जागरूक करने का एवं सकारात्मक रूप में समाज को विकसित करने का।




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